“शादी का लड्डू” — यह कहावत जितनी लोकप्रचलित है, उतनी ही यथार्थपूर्ण भी। जो इसे स्वीकार करता है, वह भी […]
“शादी का लड्डू” — यह कहावत जितनी लोकप्रचलित है, उतनी ही यथार्थपूर्ण भी। जो इसे स्वीकार करता है, वह भी जीवन के एक नए और कठोर अनुशासन से गुजरता है; और जो इससे दूर रहता है, वह भी किसी न किसी क्षण उसी प्रश्न के सम्मुख आ खड़ा होता है। विवाह, वस्तुतः, मनुष्य के जीवन का वह महत्त्वपूर्ण मोड़ है जहाँ वह निजी अस्तित्व से निकलकर साझा उत्तरदायित्व की ओर अग्रसर होता है।
विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है। यह दो संस्कारों, दो परिवारों, दो दृष्टियों और दो जीवन-शैलियों का संगम है। जब यह संगम परस्पर सम्मान, धैर्य और संवेदना से संपन्न होता है, तब जीवन में मधुरता, स्थिरता और अर्थ का संचार होता है। और जब इसमें समन्वय का अभाव होता है, तब वही संबंध बोझिल और क्लांतकारी प्रतीत होने लगता है।
एक समय था जब विवाह जीवन के स्वाभाविक क्रम का अंग माना जाता था। पहले लोग अपेक्षाकृत कम आयु में विवाह कर लेते थे, गृहस्थी बसाते थे और फिर जीवन के उत्तरदायित्वों को साथ-साथ निभाते थे। तब विवाह को जीवन-निर्वाह, वंश-वृद्धि और सामाजिक दायित्व का स्वाभाविक माध्यम समझा जाता था।
किन्तु आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। शिक्षा, करियर, आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति ने विवाह की आयु को आगे बढ़ा दिया है। यह परिवर्तन अपने आप में अनुचित नहीं है, क्योंकि आत्मनिर्भरता एक आवश्यक मूल्य है। परंतु जब यह प्रवृत्ति अत्यधिक विलंब का रूप ले लेती है, तब जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण चरण अनायास ही पीछे छूट जाते हैं।
देर से विवाह करने के अपने लाभ भी हैं। व्यक्ति अधिक परिपक्व हो जाता है, निर्णयों में अधिक स्पष्टता आ जाती है, और जीवनसाथी के चयन में भी वह अधिक सजग रहता है। किंतु इसके साथ कुछ गूढ़ कठिनाइयाँ भी जुड़ी रहती हैं। स्वभाव अधिक दृढ़ और जड़ हो सकता है, समझौते की क्षमता सीमित पड़ सकती है, तथा पारिवारिक जीवन के भावात्मक और व्यावहारिक पक्षों के लिए अतिरिक्त धैर्य की आवश्यकता होती है।
यदि विवाह बहुत अधिक विलंब से हो, तो संतान, पारिवारिक उत्तरदायित्व और दीर्घकालिक जीवन-योजना जैसे विषय और भी गंभीर हो जाते हैं। जीवन के उत्तरार्ध में आरंभ हुआ दायित्व अनेक बार ऐसी सतर्कता माँगता है, जो युवा अवस्था में सहज भाव से निभाया जा सकता था।
आज की सबसे बड़ी समस्या केवल विवाह का विलंब नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच गहराता हुआ संवाद-अंतर भी है। पूर्ववर्ती पीढ़ियाँ विवाह को कर्तव्य, स्थायित्व और सामाजिक संतुलन की दृष्टि से देखती थीं। आधुनिक पीढ़ी उसे स्वतंत्रता, चयन और व्यक्तिगत संतुष्टि के परिप्रेक्ष्य में देखती है। दोनों दृष्टियाँ अपने-अपने स्थान पर उचित हैं, किंतु जब इनका संतुलन नहीं बन पाता, तब मतभेद जन्म लेते हैं।
अनेक माता-पिता अपनी संतानों की शैक्षिक और व्यावसायिक उपलब्धियों से अत्यंत प्रसन्न होते हैं, जो स्वाभाविक भी है। परंतु उसी प्रसन्नता में कभी-कभी विवाह के उपयुक्त समय की उपेक्षा हो जाती है। जब वर्षों बाद इस विषय पर विचार किया जाता है, तब उपयुक्त संबंधों की उपलब्धता, पारस्परिक अनुकूलता और सामाजिक सहजता — सभी पर अधिक भार पड़ने लगता है।
जीवनसाथी का अर्थ केवल सह-निवास नहीं है। वह वह सहयात्री है, जिसके साथ मनुष्य अपने सुख-दुःख, आकांक्षाओं, संघर्षों और सीमाओं को साझा करता है। यह संबंध केवल आकर्षण, भावना या सामाजिक स्वीकृति पर आधारित नहीं होता; यह विश्वास, सम्मान, सहनशीलता और निरंतर संवाद पर टिकता है।
इस दृष्टि से विवाह को केवल भावनात्मक निर्णय मानना पर्याप्त नहीं। यह एक गहन जीवन-निर्णय है, जिसमें भावुकता के साथ-साथ विवेक की भी आवश्यकता होती है। जैसे दो भिन्न स्वाद मिलकर एक नया और संतुलित स्वाद रचते हैं, वैसे ही पति-पत्नी के व्यक्तित्व मिलकर एक नवीन जीवन-रचना का निर्माण करते हैं। किंतु यह रचना तभी सुंदर होती है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे के स्वभाव, मर्यादा और मौन को समझने की क्षमता रखते हों।
प्रत्येक कार्य का अपना समय होता है। यदि बीज अनुकूल ऋतु में बोया जाए, तभी वह वृक्ष बनने की संभावना रखता है। समय निकल जाने पर वही बीज प्रतीक्षा और पश्चाताप का प्रतीक बन जाता है। विवाह के विषय में भी यही सत्य लागू होता है। न तो अत्यधिक शीघ्रता उचित है, न इतना विलंब कि जीवन के अनेक अवसर निर्जीव प्रतीत होने लगें।
समय पर लिया गया निर्णय जीवन में संतुलन लाता है। विलंबित निर्णय अनेक बार केवल औपचारिकता रह जाता है और जीवन का स्वाभाविक प्रवाह बाधित होने लगता है। इसलिए विवाह को सामाजिक दबाव, व्यक्तिगत डर या बाहरी सफलता के मापदंडों से नहीं, बल्कि जीवन की समग्र परिपक्वता और सुसंगत तैयारी से जोड़कर देखना चाहिए।
विवाह न भय का विषय है, न उपहास का। वह मनुष्य के जीवन की एक गरिमामय साधना है, जिसमें दो व्यक्ति मिलकर एक साझा संसार की रचना करते हैं। यदि समय, समझ, धैर्य और अनुकूलता साथ हों, तो यही संबंध जीवन का सबसे सुंदर आश्रय बन सकता है।
अतः यह कहना अनुचित न होगा कि विवाह का लड्डू तभी मधुर प्रतीत होता है, जब उसे विवेक, संयम और उचित समय की मर्यादा में स्वीकार किया जाए।